महान संत कबीरदास के अनमोल दोहे 


नाम - कबीर दास

Nationality- भारतीय

आज हम सब पढ़ेंगे महान कबीरदास की अनमोल दोहे, आखिर उनके दोहे इतने लोकप्रिय क्यों है, आखिर ऐसा क्या ऐसा होता है उनके दोहे जो लोग खिचे चले आते है. तो इसका जवाब वे खुद देते है-

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी ।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ॥

बस यही ज्ञान है - जो आख के सामने दिख रहा वही सत्य है. एक बार भगवान बुद्ध से लोगो ने पूछा आप हमे बताईये सत्य क्या है- उन्होंने भी यही जवाब दिया जो आँख के सामने दिख रहा है वही सत्य है, तो चलिए संत कबीर दास जी के दोहे को एक-एक करके पढ़ते है. और सारा अनमोल ज्ञान को अपने जीवन में उतारते है.

Sant Kabir Ke Dohe-1




पतिबरता मैली भली, गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै, ज्यों सूरज की जोत ॥


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" पवित्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो, तब भी वह अच्छी है, चाहे उसके गले केवल कांच की मोती की माला ही, क्यों न हो फिर भी. वह अपनी सब सखियों के बिच सूर्य के तेज के समान चमकती है  "

Sant Kabir Ke Dohe-2



मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत ॥

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आपके मन में जो भावनाए होती है, आपके जीवन में वही घटित होता है जिसने मन को जीत लिया वही  विजेता है, ईश्वर को पाने का मन में विश्वाश ही ईश्वर प्राप्ति करा सकता है.

Sant Kabir Ke Dohe-3


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 64
तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी ।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ॥


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" तुम कागज पर लिखी बात सत्य कहते हो. किन्तु मै आखो देखा सच ही कहता हूँ, मै सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ, तुम उसे उलझा कर क्यों रख देते हो "

Sant Kabir Ke Dohe-4


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 63

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जैसे घड़ा के अंदर की पानी और बाहर की पानी केवल तब अलग रहती है. तब तक घड़ा फुट ना जाये. आत्मा परमात्मा दो नही, एक है आत्मा परमात्मा और परमात्मा आत्मा में विराजमान है. अंततः तब देह विलीन होती है. वह परमात्मा में ही समाकर एकाकार हो जाती है

Sant Kabir Ke Dohe-5



मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई।
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ॥

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जैसे एक समान वर्षा की बूंद तीन अलग अलग संगती (केला ,शिप ,नाग ) पाकर, उसी रूप में ढल जाता है, उसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव उसके संगती के अनुशार बदल जाता है.

Sant Kabir Ke Dohe-6


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 60
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

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मै इस संसार में बुरे व्यक्ति की खोज करने चला था, अपने मन में झाक कर देखा तो खुद से बुरा कोई न पाया.

Sant Kabir Ke Dohe-7


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 59
करता केरे गुन बहुत, औगुन कोई नाहिं।
जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं ॥


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प्रभु में गुण बहुत है अवगुण कोई नही है, जब हम अपने ह्रदय की खोज करते है, तब समस्त अवगुण अपने भीतर ही पाते है .

Sant Kabir Ke Dohe-8


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 58



झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह

झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह ॥


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जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा मिलता है तो दुगना प्रेम बढ़ता है, पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तो तब प्रेम घट जाता है

Sant Kabir Ke Dohe-9


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 57
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥


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आपके बुद्धिमत्ता का स्तर आपके उम्र पर नही आपके समझदारी पर निर्भर करती है

Sant Kabir Ke Dohe-10


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 56
मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ ।
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ ॥


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मन की इच्छा छोड़ दो उन्हें तुम अपने बल पर कभी पूरा नही कर सकते हो, यदि जल से घी निकल जायेगा, तो सुखी रोटी कोई नही खायेगा

Sant Kabir Ke Dohe-11


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 55
करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय ।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ॥


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यदि तुम अपने को कर्ता समझाते हो तो चुप क्यों बैठे हो, अपने ही कर्म करके क्यों पश्चताप करते हो, बाबुल का पेड़ लगाया है तो आम खाने को कहां से मिलेंगे

Sant Kabir Ke Dohe-12


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 54
मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै ।
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े ॥


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मन सब बातो को जानता है, जनता हुआ भी अवगुणों में फस जाता है जो दीपक हाथ में पकड़े हुए भी कुए में गिर पड़े उसकी कुशलता कैसी.

Sant Kabir Ke Dohe-13


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 53
कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार ।
हलके हलके तिरि गए बूड़े तिनि सर भार !॥


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जीवन की नौका टूटी फूटी है, उसे खेने वाला मुर्ख है जो विषय वासनाओ से युक्त है, वो ही इससे तर पाता है.

Sant Kabir Ke Dohe-14


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 51
तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ ।
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ॥


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तेरा साथी कोई भी नही है सब मनुष्य स्वार्थ में बधे हुए है, जब तक इस बात की भरोशा मन में उत्पन्न नही होता है, तब तक मनुष्य अतरआत्मा की ओर उन्मुख नही होता है.

Sant Kabir Ke Dohe-15


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 48
कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ॥


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जहा सिंदूर की रेखा है वहा काजल नही जा सकता, तब नेत्रों में राम विराज रहे है, तो वहा कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है

Sant Kabir Ke Dohe-16


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 49
जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि ।
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि ॥


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जन्म और मरण का विचार करके बुरे कर्मो पर तुझे चलाना है, उसी मार्ग का स्मरण उसे ही याद रख और सवार.

Sant Kabir Ke Dohe-17


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 50
बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥


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हमारे पास जितना कुछ बच गया है, उसके लिए सावधान हो जाना चाहिए

Sant Kabir Ke Dohe-18


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 45
ना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ॥


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हे प्रिय तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मै, अपने इन नेत्रों को बूंद कर लू, फिर न तो मै किसी दुसरो को देखू और न ही किसी और को तुम्हे देखने दू !

Sant Kabir Ke Dohe-19


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 44
इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥


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इस शरीर को दीपक बना लू उसमे प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सीचू इस तरह दीपक जला कर, मै कब अपने प्रिय के मुख का दर्शन कर पाउँगा.

Sant Kabir Ke Dohe-20


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 43

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प्रेम ♡ जीवन की सार्थकता है, प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है.

Sant Kabir Ke Dohe-21


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 42
जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ॥


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जिनके ह्रदय में न तो प्रेम है, और न प्रेम का स्वाद, वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ है प्रेम रस में दुबे रहना जीवन का सार है.

Sant Kabir Ke Dohe-22


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 40
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई ।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥


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प्रेम का बदल मेरे उपर आकर बरस पड़ा, जिससे अंतरात्मा तक भोग गयी, यह प्रेम क अपूर्व प्रभाव है, हम इसी प्रेम में क्यों नही जाते है.

Sant Kabir Ke Dohe-23


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 39

" मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि।
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि॥ "


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मै, मै करना एक अंहकार है जितना हो सके. इसे निकाल देनी चाहिए. कब तक इस रुई में लिपटी आगी रूपी अहंकार अपने पास रखूं

Sant Kabir Ke Dohe-23


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 38
यह तन काचा कुम्भ है,लिया फिरे था साथ।
ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ॥


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यह शरीर कच्चा घड़ा है, जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता है, जरा सी चोट लगते है, यह फुट जायेगा. तब भी कुछ हाथ नही आएगा.

Sant Kabir Ke Dohe-24


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 36
मानुष जन्म दुलभ है, देह न बारम्बार।
तरवर थे फल झड़ी पड्या,बहुरि न लागे डारि॥


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मनुष्य जन्म अनमोल है, ये बार-बार नही मिलता है, ये वृक्ष के फल के समान है जो एक बार गिर जाता है तो फिर दुबारा नही लगता है !

Sant Kabir Ke Dohe-25


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 35
जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥


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जो जाता है, उसे जाने दो तुम अपनी स्थिती को, ना जाने दो यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव तरह अनेक व्यक्ति. तुमसे आकर मिलेंगे.

Sant Kabir Ke Dohe-26


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 34
कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥


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जिस व्यक्ति ने प्रेम को नही चखा, वह संसार में उस अतिथि के समान है, जो संसार में अत है लेकिन यहाँ से कुछ के नही जा पाता है. 

Sant Kabir Ke Dohe-27


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 26
रात गंवाई सोय कर, दिवस गंवायो खाय ।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥


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हीरे के समान इस जीवन को मनुष्य, सिर्फ चेतना और समझदारी के बिना एक कोडी में बदल देता है.

Sant Kabir Ke Dohe-28


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 25
आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ।।


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जब तक हमारे पास समय है, हमे अपने जीवन को हरी के भगती में और अपने जिवन को सार्थक बनाने में इसे लगाना चाहिए. 

Sant Kabir Ke Dohe-29


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 23
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।


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जब तक आपका अस्तित्व होता है तब तक हरि नही मिलते है जब हरि होते है, तो आप नही होते है अर्थात हरि के ज्ञान रूपी प्रकास से मन के अज्ञानता की अंधकार मिट गया.

Sant Kabir Ke Dohe-30


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 22
मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

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इस मन की तृप्ति कभी नही होती है, इसलिए हमे सयमता से जीवन निर्णय लेनी चाहिए.

Sant Kabir Ke Dohe-31


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 21
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।


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माया और मन जल्दी से नही मरता है. इसलिए इसके स्वभाव से हमें सयमता रखनी चाहिए

Sant Kabir Ke Dohe-32


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 20
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।


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जो अपने मन को अपने वश में कर लेता है, उसे सारी सिद्धिया आसानी से मिल जाती है और वह जीवन के अपार सफलता को आसानी से हासिल कर लेता है.

Sant Kabir Ke Dohe-33


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 18
कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।


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मनुष्य का मन जहा होता है. वह पंछी के समान वहा उड़ जाता है. सारा खेल संगती का है

Sant Kabir Ke Dohe-34


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 16
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।


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परिस्थिति चाहे कुछ भी हो हमे सयमता के साथ अपनी अच्छे चीजो को नही छोड़ना चाहिए

Sant Kabir Ke Dohe-35


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 15
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।


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पानी के बुदबुदा के समान ये मनुष्य शरीर क्षण भंगुर है, हमे समय रहते अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए, नही तो जैसे सुबह होते तारा छिप जाता है, वैसे ये मनुष्य शरीर भी एक दिन संसार हमेशा के लिए छिप जाता है.

Sant Kabir Ke Dohe-36


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 14
जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।


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किसी भी वस्तु की कीमत उसके परखने वाले पर निर्भर करती है

Sant Kabir Ke Dohe-37


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 13
कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।


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केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही मोती रूपी ज्ञान को, समुद्र रूपी संसार में से चुन सकता है, मुर्ख व्यक्ति इसका भेद नही जनता है.

Sant Kabir Ke Dohe-38


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 12
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।


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हमे सबका भला सोचना चाहिए

Sant Kabir Ke Dohe-39


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 11
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।


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सिर्फ अपनी कमियां स्वीकार लेने से, हम बिना साबुन पानी के निर्मल हो जाते है.

Sant Kabir Ke Dohe-40


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 10
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।


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हर चीजं की अधिकता अच्छी नही होती है.
Extreme is Always Bad.  

Sant Kabir Ke Dohe-41


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 9
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।


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बोली एक अनमोल चीज है, हमे हमेशा बोलते समय ह्रदय रूपी तराजू से तौल के बोल बोलनी चाहिए है.

Sant Kabir Ke Dohe-42


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 8
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।


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जैसे गोताखोर गहरे पानी में से मोती ढूढ़ लाता है
और किनारे बैठा व्यक्ति जो पानी में डूबने से डरता है, हाथ कुछ नही लगता है, उसी प्रकार मेहनत करने वाला व्यक्ति वो सब कुछ पा लाता है, सोचने वाले केवल सोचते रह जाते है.  

Sant Kabir Ke Dohe-43


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 7
दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।


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हम हमेशा दुसरो के अवगुणों को देखकर हँसते है. लेकिन अगर हम अपने ही. अंदर झांके तो पाएंगे अभी अपने अंदर ही, अभी अपने अंदर ही बहुत से सुधार लाना बाकी है.

Sant Kabir Ke Dohe-44


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 6
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।


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किसी व्यक्ति की तुलना उसके ज्ञान से होनी चाहिए. न की उसके पहनावे या जाती से.
Don't Judge Book By Its Cover.

Sant Kabir Ke Dohe-45


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 5
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।


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जीवन में कभी कभी छोटी छोटी चीजे सिर्फ अज्ञानता के कारण, बड़ी समस्या का रूप ले सकती है

Sant Kabir Ke Dohe-45


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 4
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।


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अगर कोई माली सौ घड़ा भी पानी से देता है, लेकिन फल तो ऋतु आने पर ही होता है, इसलिए हर चीज का एक समय होता है उसके लिए धर्य रखना बहुत जरुरी होता है .

Sant Kabir Ke Dohe-46


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 3
 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।


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" सार्थक मनुष्य अपने जीवन में केवल सार्थक चीजो को ही करता है निरर्थक  चीजो को वो अपने जीवन से हटा देता है. 


Sant Kabir Ke Dohe-47


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 1
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।


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दुसरो मर कमियां निकलने से पहले हमे, अपने अंदर की कमियों को दूर करनी चाहिए.

Sant Kabir Ke Dohe-48


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 2
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।


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" प्रेम के वास्तविक रूप को पहचानना ही सच्चा ज्ञान कहलाता है "

Sant Kabir Ke Dohe-49


Sant-Kabir-Ke-Dohe-In-Hindi 57
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥


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आपके बुद्धिमता का स्तर आपके उम्र पर नही आपके समझदारी पर निर्भर करता है.


A Reader Lives a thousand lives before he dies.

George RR Martin Sir कहते है
" A Reader Lives a thousand lives before he dies,
And the one who doesn't read, lives just one
"
एक Reader अपने पुरे जीवन में हजारो लोगो का जीवन जीता है लेकिन एक Non-Reader केवल एक ही जीवन जीवन जी पाता है.

हम सभी Readers का यह तक पढने के लिए आभार व्यक्त करते है. आपका यहा तक पढना आपके अपने जीवन के प्रति और अधिक जानाने की उत्सुकता को दर्शाता है. हम आपके सफलता की बधाई देते है. इसे आप स्वीकार कीजिये. इस पोस्ट को आप उन लोगो के पास जरुर Share कीजिये. जिन्हें नया पढने और नया सिखने की उत्सुकता हमेशा लगी रहती है, और अपने जीवन में अपार सफलता की उचाईयो को छूना चाहते है ।

और हमे Comment के माध्यम से जरुर बताये आपको ये पोस्ट कैसा लगा अगर कोई सुझाव हो तो, कृपया जरुर बताये. आपका छोटा सा Comment  हमारे लिए बहुत Valuable होगा !
Thank You!

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